फगवाड़ा/अरोड़ा – सांस्कृतिक, लोक-विरासत और पारंपरिक मूल्यों को संजोने तथा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के उद्देश्य से ‘तीज का त्योहार’ बड़ी धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर कॉलेज का प्रांगण पंजाबी संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया।
समारोह में एस.डी.एम. फगवाड़ा नवजोत शर्मा ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की, जबकि हरपाल कौर धंजल (ब्राउन कुड़ी) ने विशेष अतिथि के रूप में समारोह की शोभा बढ़ाई। इस अवसर पर कॉलेज कमेटी के चेयरमैन विकास उप्पल तथा स्थानीय कॉलेज कमेटी के सदस्य पूजा उप्पल, ओम उप्पल और कविता उप्पल ने भी समारोह में शिरकत की। सिक्का जी, मलकीअत सिंह रघबोत्रा तथा आसपास के गांवों की महिला सरपंचों एवं पंचों और विद्यार्थियों के अभिभावकों ने भी विशेष रूप से पहुंचकर समारोह की रौनक बढ़ाई।
मुख्य अतिथि द्वारा कॉलेज परिसर में पौधा लगाकर पर्यावरण एवं हरियाली का संदेश दिया गया। इस अवसर पर कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. किरणजीत रंधावा ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि तीज पंजाबी संस्कृति का एक अनूठा और प्यारा त्योहार है, जो पंजाब की बेटियों की खुशियों, मिल-बैठने की परंपरा और लोक जीवन की सुहावनी यादों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि ऐसे समारोहों के माध्यम से विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा, लोकगीतों, लोकनृत्यों और पारंपरिक विरासत से नजदीकी से जोड़ा जा सकता है। सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए रखने में युवा पीढ़ी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
समारोह के दौरान कॉलेज की छात्राओं ने पारंपरिक पंजाबी परिधानों और आभूषणों से सजकर तीज की रौनक को और बढ़ा दिया। उनके द्वारा गिद्धा, बोलियां, लोकगीत और अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से पंजाबी लोक-विरासत की खूबसूरत झलक प्रस्तुत की गई। इस अवसर पर प्राचीन पंजाबी रहन-सहन और लोक-जीवन से संबंधित विभिन्न पारंपरिक वस्तुओं की प्रदर्शनी भी लगाई गई। इन वस्तुओं के माध्यम से पुराने पंजाब की सादगी भरी जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाया गया। प्रदर्शनी और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने समारोह में पहुंचे अतिथियों एवं उपस्थित जनसमूह का विशेष ध्यान आकर्षित किया।
समारोह के अंत में प्रिंसिपल डॉ. रंधावा द्वारा सभी अतिथियों का धन्यवाद किया गया। अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित भी किया गया। उन्होंने विद्यार्थियों और स्टाफ की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे समारोह केवल मनोरंजन का साधन ही नहीं, बल्कि अपनी मातृभाषा, संस्कृति और लोक-विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सुंदर माध्यम भी हैं।
Jiwanjot Savera