डी.ए.वी. यूनिवर्सिटी में “प्राचीन भारत से आधुनिक सैन्य युद्ध तक नेतृत्व के पाठ” विषय पर विशेष संगोष्ठी का आयोजन

जालंधर (अरोड़ा) :- डी.ए.वी. यूनिवर्सिटी, जालंधर की कॉमर्स, बिजनेस मैनेजमेंट और ह्यूमैनिटीज फैकल्टी की ओर से “प्राचीन भारत से आधुनिक सैन्य युद्ध तक नेतृत्व के पाठ” विषय पर एक बेहद रोचक और ज्ञानवर्धक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं को आधुनिक नेतृत्व और रणनीति के सिद्धांतों से जोड़ना था, ताकि विद्यार्थियों को आध्यात्मिक और आधुनिक दोनों दृष्टिकोणों की समझ मिल सके। इस अवसर पर देबासिस सतपथी, मुख्य महाप्रबंधक, एन.बी.सी.सी., नई दिल्ली, और मेजर जनरल (डॉ.) रंजीत सिंह, एस.एम., वी.एस.एम. (सेवानिवृत्त) मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। दोनों वक्ताओं ने प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक नेतृत्व दर्शन के बीच गहरे संबंधों पर चर्चा की। डी.ए.वी. यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. (डॉ.) मनोज कुमार ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि दोनों विद्वान वक्ताओं ने नेतृत्व और रणनीति के विषय पर बहुआयामी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा, “इस सत्र ने भारत की प्राचीन सभ्यता की बुद्धि को आधुनिक दृष्टिकोण से जोड़ा है। यह हमें याद दिलाता है कि ज्ञान, नैतिकता और अनुकूलनशीलता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी प्राचीन समय में थीं।”

यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार प्रो. (डॉ.) एस. के. अरोड़ा ने इस विचारोत्तेजक संगोष्ठी के आयोजन के लिए कॉमर्स, बिजनेस मैनेजमेंट और ह्यूमैनिटीज फैकल्टी की प्रशंसा की। उन्होंने कहा, “सच्चा नेतृत्व अधिकार से नहीं बल्कि चरित्र से पहचाना जाता है। यह प्रेरणादायक है कि हमारे विद्यार्थी आध्यात्मिक और रणनीतिक दोनों पहलुओं से नेतृत्व के गुण सीख रहे हैं।” देबासिस सतपथी ने अपने संबोधन में महाभारत को नेतृत्व के गहन ज्ञान का स्रोत बताया और इसके पात्रों व घटनाओं को जीवन और प्रबंधन के पाठ के रूप में समझाया। उन्होंने कहा कि कर्ण से हम कठिन परिस्थितियों में भी दृढ़ता और साहस सीखते हैं, जबकि अर्जुन से लक्ष्य के प्रति स्पष्टता और एकाग्रता। उन्होंने कहा कि सच्चा नेता वही है जो आत्मविश्वास रखता हो, दूसरों के प्रति सहानुभूति रखे और नैतिकता के साथ निर्णय ले। उन्होंने कहा, “जीवन की हर चुनौती हमारे चरित्र की परीक्षा होती है। महाभारत केवल एक महाकाव्य नहीं है, बल्कि यह जीवन और नेतृत्व का मार्गदर्शक ग्रंथ है।” मेजर जनरल (डॉ.) रंजीत सिंह ने भारत की सैन्य परंपरा और आधुनिक युद्ध प्रणालियों पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने चाणक्य की राजनीति से लेकर छत्रपति शिवाजी की गुरिल्ला रणनीति तक के उदाहरण देते हुए बताया कि ये सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उन्होंने मनोवैज्ञानिक और साइबर युद्ध के बढ़ते खतरों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि हर नागरिक को डिजिटल रूप से जागरूक और जिम्मेदार होना चाहिए। उन्होंने कहा, “21वीं सदी में युद्ध केवल मैदान में नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया में भी लड़ा जा रहा है। इसलिए हर भारतीय को नैतिकता और सजगता के साथ राष्ट्र की सुरक्षा में योगदान देना चाहिए।” कार्यक्रम के अंत में डॉ. गीति‍का नागरथ, डीन, फैकल्टी ऑफ कॉमर्स, बिजनेस मैनेजमेंट एंड ह्यूमैनिटीज, और सुश्री मोनिका सुपैया, कोऑर्डिनेटर, डिपार्टमेंट ऑफ इंग्लिश द्वारा संचालित पैनल चर्चा में विद्यार्थियों और वक्ताओं के बीच रोचक विचार-विमर्श हुआ। अंत में डॉ. गीति‍का नागरथ ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए दोनों विद्वान वक्ताओं और सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “दोनों वक्ताओं ने प्राचीन भारतीय दर्शन को आधुनिक जीवन से बहुत सुंदर तरीके से जोड़ा। जीवन और नेतृत्व पर उनके विचार हमारे विद्यार्थियों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक हैं।” उन्होंने कहा कि डी.ए.वी. यूनिवर्सिटी का उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय मूल्यों और ज्ञान परंपराओं से जोड़ते हुए 21वीं सदी की क्षमताओं से सशक्त बनाना है।

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