जालंधर (अरोड़ा) :- राजनीति विज्ञान मंच के तत्वावधान में, स्नातकोत्तर राजनीति शास्त्र विभाग द्वारा इस महत्वपूर्ण विषय पर एक विशेषज्ञ व्याख्यान आयोजित किया गया। राजनयिक एवं विदेश मामलों में दीर्घ अनुभव रखने वाले सेवानिवृत्त राजदूत रमेश चंद्र इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता थे। कॉलेज की परंपरा के अनुरूप, कार्यक्रम का शुभारंभ डी.ए.वी. गान के सामूहिक गायन से हुआ। इस औपचारिक प्रारंभ ने संस्थान के आदर्शों एवं गौरवशाली परंपरा के प्रति उसकी निष्ठा को प्रतिबिंबित किया। तत्पश्चात मुख्य वक्ता का स्वागत ‘हरित अभिनंदन’ के रूप में एक पौधा भेंट कर किया गया, जो स्थिरता एवं सद्भाव का प्रतीक है। सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उन्हें शॉल एवं स्मृति-चिह्न भी प्रदान किया गया।
परिचयात्मक उद्बोधन:
अपने परिचयात्मक उद्बोधन में राजनीति शास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. दिनेश अरोड़ा ने इस व्याख्यान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वैश्वीकरण के वर्तमान युग में विश्व के किसी भी क्षेत्र में घटित घटनाएँ अन्य देशों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि 28 फरवरी 2026 को ईरान पर अमेरिका एवं इज़राइल द्वारा किए गए आक्रमण से आरंभ हुआ यह संकट अब वैश्विक स्तर पर राजनीतिक, आर्थिक एवं सामरिक प्रभाव उत्पन्न कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस व्याख्यान का उद्देश्य विद्यार्थियों एवं प्राध्यापकों को पश्चिम एशिया में जारी संकट, उसके कारणों, परिणामों तथा विश्व राजनीति में उभरती प्रवृत्तियों के प्रति जागरूक करना है। यह कार्यक्रम क्षेत्रीय भू-राजनीतिक घटनाक्रमों तथा वैश्विक शांति एवं सुरक्षा पर उनके प्रभावों की गहन समझ विकसित करने के लिए आयोजित किया गया है।
उन्होंने यह भी कहा कि इस जटिल परिस्थिति की गहराई को समझने के लिए हमारे बीच अनुभवी पूर्व राजनयिक श्री रमेश चंद्र की उपस्थिति हमारे लिए अत्यंत सौभाग्य का विषय है। साथ ही, उन्होंने इस आयोजन के लिए प्राचार्य डॉ. अनूप कुमार के प्रति आभार व्यक्त किया तथा विद्यार्थियों को सक्रिय सहभागिता हेतु प्रेरित किया।
उद्घाटन संबोधन:
प्राचार्य डॉ. अनूप कुमार ने कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन करते हुए मुख्य वक्ता, संकाय सदस्यों एवं विद्यार्थियों का स्वागत किया। उन्होंने गर्वपूर्वक राजदूत रमेश चंद्र का परिचय संस्थान के विशिष्ट पूर्व छात्र के रूप में कराया तथा उनके उत्कृष्ट राजनयिक जीवन का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का सफलतापूर्वक प्रतिनिधित्व किया है। उन्होंने कहा कि यह संस्थान के लिए गौरव का विषय है कि ऐसा प्रख्यात पूर्व छात्र अपने अनुभव सांझा करने हेतु पुनः संस्थान में उपस्थित हुआ है। उन्होंने इस विषय की समकालीन प्रासंगिकता पर बल देते हुए कहा कि पश्चिम एशिया की राजनीतिक परिस्थितियों को समझना न केवल विद्यार्थियों, अपितु सामान्य नागरिकों के लिए भी आवश्यक है। साथ ही, उन्होंने इस महत्वपूर्ण विषय पर कार्यक्रम आयोजित करने हेतु राजनीति शास्त्र विभाग की सराहना की।
मुख्य व्याख्यान:
राजदूत रमेश चंद्र (सेवानिवृत्त) ने “पश्चिम एशिया में जारी संकट: विश्व राजनीति में उभरती प्रवृत्तियाँ” विषय पर अपना विचारोत्तेजक एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने इस संकट के कारणों एवं परिणामों का व्यापक विश्लेषण करते हुए वैश्विक शांति एवं सुरक्षा पर इसके दूरगामी प्रभावों को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस संकट में गहराई से संलग्न है, जहाँ एक ओर अमेरिका, इज़राइल तथा उनके सहयोगी हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान एवं उसके सहयोगी। पश्चिम एशिया, विशेषतः मध्य-पूर्व एवं खाड़ी क्षेत्र, प्रत्यक्ष संघर्ष एवं सैन्य अभियानों का केंद्र बन चुका है, जो ईरान के विस्तारित प्रभाव क्षेत्र के कारण एक प्रकार का ‘अनिवार्य संघर्ष’ प्रतीत होता है। संघर्ष की उत्पत्ति पर विचार करते हुए उन्होंने बताया कि 1947 में संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना के अंतर्गत भूमि को पृथक-पृथक यहूदी एवं अरब राष्ट्रों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा गया था। इस प्रस्ताव को यहूदी नेतृत्व ने स्वीकार कर लिया, किन्तु अरब नेतृत्व ने अस्वीकार कर दिया। इज़राइल के गठन के साथ ही इज़राइल और फ़िलिस्तीन के मध्य संघर्ष निरंतर जारी रहा। इसी कारण प्रारम्भ से ही इज़राइल और ईरान के संबंध परस्पर वैमनस्यपूर्ण रहे हैं। उन्होंने इस संकट की उत्पत्ति तथा उसके विकास का विस्तृत वर्णन किया, जिससे विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को उन ऐतिहासिक तथा राजनीतिक कारणों को समझने में सहायता मिली, जिन्होंने वर्तमान परिस्थितियों को जन्म दिया है। उन्होंने इस क्षेत्र को आकार देने वाली व्यापक भू-राजनीतिक गतिशीलताओं का भी विश्लेषण किया तथा संघर्ष के संभावित परिणामों पर प्रकाश डाला। यह वर्तमान संकट 28 फ़रवरी, 2026 को तब प्रारम्भ हुआ, जब अमेरिका एवं इज़राइल ने ईरान के राजनीतिक एवं सैन्य नेतृत्व का उन्मूलन करने के उद्देश्य से उस पर आक्रमण किया। इन आक्रमणों को अमेरिका ने ‘ऑपरेशन एपिक फ़्यूरी’ तथा इज़राइल ने ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ नाम दिया। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई तथा उसके अनेक सैन्य एवं वैज्ञानिक शीर्ष व्यक्तित्व मारे गए। अमेरिका एवं इज़राइल को यह आशा थी कि सर्वोच्च नेता के निधन के पश्चात ईरान में आंतरिक विद्रोह भड़क उठेगा और वे तेहरान में अपनी अनुकूल सरकार स्थापित करने में सफल होंगे। किन्तु इसके विपरीत, ईरान ने प्रत्युत्तरात्मक कार्रवाई करते हुए न केवल इज़राइल पर आक्रमण किया, अपितु मिसाइल प्रहारों के माध्यम से संघर्ष का विस्तार उन पड़ोसी अरब देशों तक कर दिया, जहाँ अमेरिका के सैन्य अड्डे एवं वायुसेना ठिकाने स्थित हैं। इस प्रकार यह संघर्ष अब समूचे मध्य-पूर्व तथा उससे आगे तक फैलकर एक क्षेत्रीय युद्ध का रूप धारण कर चुका है। इस संघर्ष ने विश्व को दो ध्रुवों में विभाजित कर दिया है, जिसके दूरगामी परिणाम वैश्विक शांति व्यवस्था के लिए अत्यंत चिंताजनक हैं—विशेषतः संयुक्त राष्ट्र के चार्टर तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संधियों, कूटनीति और राजनीतिक आचार-व्यवहार के संदर्भ में। भारत के लिए यह स्थिति उसकी विदेश नीति, अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक संरचना—विशेषकर सांप्रदायिक सद्भाव—की दृष्टि से अत्यंत गंभीर है, क्योंकि भारत में शिया मुसलमानों की एक विशाल जनसंख्या निवास करती है, जो ईरान के लोगों के साथ आत्मीय संबंध अनुभव करती है। भारत जैसे मध्यम शक्ति संपन्न राष्ट्रों तथा उसके समविचारी सहयोगियों को—जो ‘बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था’ तथा अपने सभ्यतागत मूल्यों, जैसे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, में विश्वास रखते हैं—अब निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए। उन्हें अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति के अनुरूप सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। वस्तुतः भारत 1.4 अरब जनसंख्या वाला एक विशाल राष्ट्र, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र तथा तीव्र गति से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, और भगवान बुद्ध तथा महात्मा गांधी के महान संदेशों का संवाहक है। भारत पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार करते हुए उन्होंने जटिल अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से निपटने में भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति पर विशेष बल दिया। उनके अनुसार, यह दृष्टिकोण भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए संतुलित कूटनीतिक संबंध बनाए रखने में समर्थ बनाता है। उन्होंने अपने व्याख्यान का समापन गुरु गोबिंद सिंह जी के एक व्यावहारिक संदेश के साथ किया, जो उन्होंने फ़ारसी भाषा में अपनी रचना “ज़फ़रनामा” (विजय पत्र) में व्यक्त किया है:
“चू कार अज़ हमह हीलत दर गुज़श्त, हलाल अस्त बुरदन बा शमशीर दस्त।” अर्थात जब सभी उपाय निष्फल हो जाएँ, तब शस्त्र उठाना न्यायोचित है। आइए, हम बिगड़ती हुई वैश्विक शांति व्यवस्था की रक्षा के लिए न्याय, समानता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व की ‘तलवार’ उठाएँ। उनके व्याख्यान ने समकालीन विश्व राजनीति पर बहुमूल्य अंतर्दृष्टि प्रदान की तथा विद्यार्थियों एवं प्राध्यापकों को पश्चिम एशिया संकट से उत्पन्न चुनौतियों की गहन समझ प्रदान की।
संवादात्मक सत्र:
व्याख्यान के उपरांत एक संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया, जिसमें विद्यार्थियों एवं प्राध्यापकों ने सक्रिय सहभागिता की। इस दौरान प्रतिभागियों को पश्चिम एशिया संकट तथा समकालीन वैश्विक राजनीति के विभिन्न आयामों पर प्रश्न पूछने एवं स्पष्टीकरण प्राप्त करने का अवसर मिला। मुख्य वक्ता ने सभी प्रश्नों का धैर्यपूर्वक उत्तर दिया तथा अपने समृद्ध कूटनीतिक अनुभव के आधार पर महत्वपूर्ण विचार सांझा किये। इस संवाद ने सत्र को और अधिक रोचक एवं ज्ञानवर्धक बना दिया। इस अवसर पर एम.ए. राजनीति शास्त्र (सेमेस्टर-IV) के छात्र चंदन माहे को जनवरी 2026 में आयोजित एनटीए यूजीसी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) उत्तीर्ण करने के लिए सम्मानित किया गया। प्राचार्य डॉ. अनूप कुमार ने इस विशिष्ट उपलब्धि के लिए उन्हें तथा राजनीति शास्त्र विभाग को हार्दिक बधाई दी।
धन्यवाद ज्ञापन:
कार्यक्रम का समापन राजनीति विज्ञान फ़ोरम के अध्यक्ष प्रो. कुलदीप खुल्लर द्वारा प्रस्तुत औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने एक ज्ञानवर्धक एवं अंतर्दृष्टिपूर्ण व्याख्यान हेतु मुख्य वक्ता के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। साथ ही, उन्होंने कार्यक्रम के सफल आयोजन में सहयोग हेतु प्राचार्य एवं कॉलेज प्रशासन का धन्यवाद किया तथा स्टाफ़ सदस्यों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी की सराहना की। इस अवसर पर प्रो. सोनिका दानिया (उप-प्राचार्या), डॉ. एस.के. खुराना (अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष), डॉ. राजन शर्मा, डॉ. राज कुमार, डॉ. ईशा, प्रो. अमृतपाल सिंह एवं प्रो. अभिजीत सिंह भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन बी.ए. अंतिम वर्ष की छात्रा सुश्री मुस्कान शर्मा द्वारा किया गया, जिनकी प्रभावशाली वाक्पटुता ने पूरे कार्यक्रम के दौरान श्रोताओं को आकर्षित बनाए रखा।
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