Wednesday , 18 February 2026

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में ‘हिंदी साहित्य में किसान-विमर्श’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

अमृतसर/मक्कड़ : गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग एवं कृषि अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र द्वारा ‘रुसा 2.0’ (RUSA 2.0) के सहयोग से ‘हिंदी साहित्य में किसान-विमर्श’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी के संयोजक और विभागाध्यक्ष प्रो. सुनील शर्मा ने स्वागत भाषण में कहा कि किसान केवल एक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा है। उन्होंने कृषि संकट और ऋणग्रस्तता जैसे ज्वलंत मुद्दों पर साहित्य की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उद्घाटन वक्तव्य में प्रो. के.के. शर्मा (जामिया मिलिया इस्लामिया) ने कहा कि किसान-विमर्श साहित्य को केवल भावात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित न रखकर सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम बनाता है।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी (कुलपति, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय) ने कहा कि भारत मूलतः कृषि-प्रधान देश है जहाँ किसान सांस्कृतिक चेतना के वाहक हैं। मुख्य अतिथि प्रो. सतनाम सिंह दयोल और विशेष अतिथि प्रो. गुरमीत सिंह ने प्रेमचंद के ‘गोदान’ और रेणु के ‘मैला आँचल’ का संदर्भ देते हुए किसान की दारुण स्थिति और नैतिक संघर्ष पर प्रकाश डाला। इस सत्र में प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी, डॉ. निर्मल कौशिक, शांति कुमार स्याल और रमन कुमार शर्मा की पुस्तकों का विमोचन भी किया गया।

मध्याह्न काल के सत्र की अध्यक्षता डॉ. भवानी सिंह (शिमला) ने की। डॉ. सिद्धार्थ शंकर राय (महेंद्रगढ़) ने नागार्जुन और त्रिलोचन की कविताओं के माध्यम से भूमंडलीकरण और बाजारवादी दबावों पर चर्चा की। मुख्य अतिथि डॉ. रजनी प्रताप और विशेष अतिथि डॉ. अनिल कुमार ने किसान-विमर्श को सांस्कृतिक और वैचारिक संदर्भों में समझने की आवश्यकता पर बल दिया। इस सत्र में डॉ. कंवलजीत कौर, रोबिन, सुनयना अरोड़ा और डॉ. निर्मल कौशिक ने प्रपत्र प्रस्तुत किए।

भोजनावकाश के बाद आयोजित अंतिम सत्र की मुख्य अतिथि डॉ. शैली जग्गी (हिंदी विभाग, बीबीके डीएवी महिला महाविद्यालय, अमृतसर) रहीं। उन्होंने किसान-विमर्श को एक नई और सूक्ष्म दृष्टि प्रदान करते हुए कहा कि इस विमर्श को अनिवार्य रूप से ‘लैंगिक दृष्टि’ से देखने की आवश्यकता है। डॉ. जग्गी ने जोर देकर कहा कि खेतों में बुवाई से लेकर कटाई तक स्त्रियों का श्रम अत्यधिक और महत्वपूर्ण होता है, किंतु विडंबना यह है कि साहित्य और समाज दोनों में ही उनका यह योगदान अक्सर उपेक्षित या ‘अदृश्य’ बना रहता है। उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यमों और नई विधाओं के माध्यम से आज किसान जीवन की अभिव्यक्ति के नए आयाम खुल रहे हैं, जिससे ग्रामीण संवेदनाओं को वैश्विक मंच मिल रहा है।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. सुखदेव सिंह मिन्हास ने कहा कि किसान-विमर्श सामाजिक-आर्थिक संरचना की आलोचनात्मक पड़ताल है। विशेष अतिथि डॉ. समीर महाजन और प्रो. अमनदीप सिंह ने भी विचार रखे। इस अवसर पर डॉ. विशाल भारद्वाज, प्रो. मनजिंदर सिंह, डॉ. सपना शर्मा सहित विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे। डॉ नेहा हंस ने संगोष्ठी की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुति दी।अंत में प्रो. सुनील शर्मा ने सभी अतिथियों और सहयोगी संस्थानों का आभार व्यक्त किया।

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